Monday, February 17, 2014

रौशनी के लिए |


आखिर कब तक तरसेंगे चराग
क्या इंतज़ार में ही परवाने हो जायेंगे फना. , रौशनी के लिए |

लहरों , समुन्दरों और तूफानों से खेल रहे रोज
अब क्या डूब कर उतरायें , रौशनी के लिए |

कंकड , पत्थर ,पीर –औलिया पूजे सब
अब क्या चढ़ मस्जिद पर बाँग लगाएं , रौशनी के लिए |

लोगे बातें कहते रहे , हम सुनते रहें चुपचाप
अब क्या लोगों को हम सुनाएं , रौशनी के लिए |

जब कुछ ना रहा पास तो बाँट दिया अपने आप को
अब क्या खुद झोली फैलायें, रौशनी के लिए |

मिन्नते करते रहें तो कभी रात-दिन लड़ते रहें
अब क्या जिल्लतों को दस्तूर बनाएँ , रौशनी के लिए |

जागते हुए जलते रहे हर पहर , एक आस में
  अब क्या सूरजों पर सो जायें , रौशनी के लिए |


-अमित ‘भूदेव’

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