रौशनी के लिए |
आखिर कब तक तरसेंगे चराग
क्या इंतज़ार में ही परवाने
हो जायेंगे फना. , रौशनी के लिए |
लहरों , समुन्दरों और
तूफानों से खेल रहे रोज
अब क्या डूब कर उतरायें , रौशनी
के लिए |
कंकड , पत्थर ,पीर –औलिया
पूजे सब
अब क्या चढ़ मस्जिद पर बाँग
लगाएं , रौशनी के लिए |
लोगे बातें कहते रहे , हम
सुनते रहें चुपचाप
अब क्या लोगों को हम सुनाएं
, रौशनी के लिए |
जब कुछ ना रहा पास तो बाँट
दिया अपने आप को
अब क्या खुद झोली फैलायें,
रौशनी के लिए |
मिन्नते करते रहें तो कभी रात-दिन लड़ते
रहें
अब क्या जिल्लतों को दस्तूर
बनाएँ , रौशनी के लिए |
जागते हुए जलते रहे हर
पहर , एक आस में
अब क्या सूरजों पर सो जायें
, रौशनी के लिए |
aag ko roshni ki jarurat kya
ReplyDeleteek phoonk chahiye tapish bhi hogi roshni bhi
Ek dum sahi :-)
DeleteSuper duper
ReplyDeleteGreat work Amit
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