ऐ मेरे प्रेम रूपी देवता
कर रहा हैं रोम – रोम क्रन्दन तेरी चाह में ,
मैंने जला कर रखे हैं नयनदीप तेरी राह में,
हो गया हैं गौर से श्याम से , ये वर्ण इस संताप में ,
अब तो आ जाओ , मेरे इस बिन सूर्य के संसार में ,
ऐ मेरे प्रेम रूपी देवता
खत्म होती दिख रही हैं मेरी कल्पनाओं की सीमाएँ ,
बह चली हैं सागरों सी उमड़कर मेरी निराशाए ,
सुन्दर सव्प्नो का होम हुआ , अब दुस्वप्नो की बस धाराएँ
अब तो आ जाओ , और तृप्त करो मेरी तृष्णाये ,
ऐ मेरे प्रेम रूपी देवता
दिशाओ को भूल में , अब तक रहा हूँ हर ओर
ध्वनियों से हो अचंभित में सुन रहा हूँ हर शोर
विषयों का मोह छोड़ , हृदय हर क्षण हो रहा जोर
अब तो आ जाओ , और रंग दो मेरा हर छोर ,
ऐ मेरे प्रेम रूपी देवता
सह - सह के शूलों को यह हृदय बन ना जाये शूल
सारी स्मृतियों को मिटाकर , में भूला अपना मूल
पाषाणों से प्रेम करूं मैं , मरुस्थलों में ढूँढूँ फूल
अब तो आ जाओ , करो इस वेदना को धूल
ऐ मेरे प्रेम रूपी देवता
-अमित गुप्ता