बढ़ती उमर
बचपने से ,लड़कपने से,
बढ़ रहे
लम्बी जबान , टेढ़ी नज़र
बढ़ती उमर
ख्वाब ऊँचे , बात ऊँची
कर रहे
आठों पहर , इधर-उधर
बढ़ती उमर
दर्द को ,माँ -बाप के
समझ रहे
बार -बार काट कर, कचोट कर
बढ़ती उमर
उसकी यादें , उनकी बातें कर
रो रहे
कश खींचे , बोतले पीकर
बढ़ती उमर
पांच दिन खो कर , दो दिन
जी रहे
डगर -डगर घूम कर , झूम कर
बढ़ती उमर
लम्बी कमाई , सत्य की दुहाई
दे रहे
चुरा कर , ' कर' और ' आयकर '
बढ़ती उमर
प्यार करते , रोज़ गिरते
दिख रहे
ज़िगर में बस ,छाती और क़मर
बढ़ती उमर
अड़ रहे -लड़ रहे , दिल ही दिल
जल रहे
आपको देखकर
बढ़ती उमर |
रचयिता - अमित गुप्ता 'भूदेव'