Sunday, May 1, 2011

हो गई होगी रात रुआँसी


जिस रात हैवानियत नाची थी जननी के  चारों ओर ,
घूरा होगा सब शैतानों ने उसको , कैसी मची वासनाओ की होड़ ,

उछले होंगे , झपटे होंगे  , जब करने को शिकार
तब बचाने को अपना संसार , जननी पगलाई सी भागी होगी
तब हो गई होगी  रात रुआँसी , अनहोनी भी घबराई होगी

लपक के खींचा और उछाला गया होगा, उसका दामन
निकल आये होंगे नाखून ,खुरचने को जननी का तन-मन
तब  कोमल हाथो से खुद को ढकने को जननी अकुलाई होगी  
तब हो गई होगी विवश लाचारी भी , लज्जा भी खुद में शरमाई होगी

कोई नाग लिपटा होगा  पैरों में , तो किसी ने जकड़ी होगी गर्दन
गिरा दिया होगा  धरा पर जननी को , करने को उसका मान-मर्दन
तब होने को मुक्त जननी के रोम –रोम ने शक्ति लगाईं होगी   
तब सन्नाटे भी चीखे होंगे  , आजादी भी  छटपटाई  होगी

सबने खाया होगा नोच –नोच के ,  सबने होगा उसे चबाया
तन-मन को उसके पी लिया घोल के , आत्मा को भी जलाया
तब रही सिसकती होगी जननी , पटक-पटक के पाँव
तब आशायें भी निराश हुई , मिल गई धुप में छाँव

रौंद रहे कुसुम को पैरों तले, उसके ही माली
जब किनारे ही नदी को डुबो रहे , तो कौन करे रखवाली  
                                                     
                                                         रचयिता – अमित गुप्ता