पहाड़ी बादल
घरों में घुस आते
बादल
धुओं में छिप जाते
बादल
मगर ये बादल वो बादल
तो नहीं हैं
जो इतराते हैं
इठलाते हैं
आसमां में टंगे हुए
हमें चिढ़ाते हैं
ये तो पहाड़ी बादल
हैं
जो बड़े ही मिलनसार
हैं
राह चलते मिल जाते
हैं
गले से लग ,घुल –मिल
जाते हैं
इनका कोई ठिकाना
नहीं हैं
बड़े घरों में भी
आना-जाना नहीं हैं
यों ही आवारा हैं
फिरते
घूमते गाते चलते
विचरते
कहीं भी कभी भी आ
जाते हैं
खिड़की ,दरवाजों
,सुराखों में समां जाते हैं
बड़े ही बेतकलुफ्फ़
मिज़ाज ये बादल
घरों में घुस आते
बादल
धुओं में छिप जाते
बादल |
n अमित