Saturday, April 24, 2010

ऐ मेरे प्रेम रूपी देवता


ऐ मेरे प्रेम रूपी देवता

कर रहा हैं रोम – रोम क्रन्दन तेरी चाह में ,
मैंने जला कर रखे हैं नयनदीप तेरी राह में,
हो गया हैं गौर से श्याम से , ये वर्ण इस संताप में ,
अब तो आ जाओ , मेरे इस बिन सूर्य के संसार में ,
ऐ  मेरे प्रेम रूपी देवता
खत्म होती दिख रही हैं मेरी कल्पनाओं की सीमाएँ ,
बह चली हैं सागरों सी उमड़कर मेरी निराशाए ,
सुन्दर सव्प्नो का होम हुआ , अब दुस्वप्नो की बस धाराएँ
अब तो आ जाओ , और तृप्त करो मेरी तृष्णाये ,
ऐ मेरे प्रेम रूपी देवता
दिशाओ को भूल में , अब तक रहा हूँ हर ओर
ध्वनियों से हो अचंभित में सुन रहा हूँ हर शोर
विषयों का मोह छोड़ , हृदय हर क्षण हो रहा जोर
अब तो आ जाओ  , और रंग दो मेरा हर छोर ,
ऐ मेरे प्रेम रूपी देवता
सह - सह के शूलों को यह हृदय बन ना जाये शूल
सारी स्मृतियों को मिटाकर , में भूला अपना मूल
पाषाणों से प्रेम करूं मैं , मरुस्थलों में ढूँढूँ फूल
अब तो आ जाओ  , करो इस वेदना को धूल
ऐ मेरे प्रेम रूपी देवता
-अमित गुप्ता

8 comments:

  1. interesting....waiting fr the next poem......

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  2. bhai gazab tu to bs kamaal kr diya yaar.......

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  3. wow amit...its amazing....keep writing..u r amazing!!! waiting to read more of ur poems...

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  4. Never doubted - u could write
    But so fine a piece...
    simply transcends the imagination
    of a simple being

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  5. Hey!!!!! Its very Nice....really a good one..Keep it up!!!! :)

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  6. very Nice Poem Amit.........

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  7. nice weaving of imagination...

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