ऐ मेरे प्रेम रूपी देवता
कर रहा हैं रोम – रोम क्रन्दन तेरी चाह में ,
मैंने जला कर रखे हैं नयनदीप तेरी राह में,
हो गया हैं गौर से श्याम से , ये वर्ण इस संताप में ,
अब तो आ जाओ , मेरे इस बिन सूर्य के संसार में ,
ऐ मेरे प्रेम रूपी देवता
खत्म होती दिख रही हैं मेरी कल्पनाओं की सीमाएँ ,
बह चली हैं सागरों सी उमड़कर मेरी निराशाए ,
सुन्दर सव्प्नो का होम हुआ , अब दुस्वप्नो की बस धाराएँ
अब तो आ जाओ , और तृप्त करो मेरी तृष्णाये ,
ऐ मेरे प्रेम रूपी देवता
दिशाओ को भूल में , अब तक रहा हूँ हर ओर
ध्वनियों से हो अचंभित में सुन रहा हूँ हर शोर
विषयों का मोह छोड़ , हृदय हर क्षण हो रहा जोर
अब तो आ जाओ , और रंग दो मेरा हर छोर ,
ऐ मेरे प्रेम रूपी देवता
सह - सह के शूलों को यह हृदय बन ना जाये शूल
सारी स्मृतियों को मिटाकर , में भूला अपना मूल
पाषाणों से प्रेम करूं मैं , मरुस्थलों में ढूँढूँ फूल
अब तो आ जाओ , करो इस वेदना को धूल
ऐ मेरे प्रेम रूपी देवता
-अमित गुप्ता
interesting....waiting fr the next poem......
ReplyDeletebhai gazab tu to bs kamaal kr diya yaar.......
ReplyDeletewow amit...its amazing....keep writing..u r amazing!!! waiting to read more of ur poems...
ReplyDeleteNever doubted - u could write
ReplyDeleteBut so fine a piece...
simply transcends the imagination
of a simple being
Hey!!!!! Its very Nice....really a good one..Keep it up!!!! :)
ReplyDeleteNice poem....
ReplyDeletevery Nice Poem Amit.........
ReplyDeletenice weaving of imagination...
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