Friday, August 6, 2010

मत रोक मुझे माँ

मत रोक मुझे माँ

मत रोक मुझे  माँ जी भर कर जी लेने दो आज को
खुल जाने दो इस बहाव को ,बह जाने दो इस बयार को

आज करने दो मुझे श्रृंगार नित नए- नए अपने केशों से
कि कल तो इनको जाना है नित नए-नए अवसादों में

आज  अट्टाहास करने दो माँ ,हर क्षण और हर काल में
कि कल चेहरा मेरा डूब जाएगा इस सांसारिक जंजाल में

आज मत करो हल्दी चन्दन ,दिखने दो मेरा  श्याम वर्ण
कि कल तो उजले मुखोटों लगाकर जाना ही हैं बाजार को

आज मत मुझे डराओ माँ , उस कोने में खड़े अंधकार से
कि कल से तो ये रहेगा बाहर भीतर मेरे और घर द्वार के

आज देकर गेंद भेजो मुझे इन खेलों के मैदानों में
कि कल तो होंगे खेल सारे इर्ष्या और अभिमानो के

आज मुझे चूमने दो मिटटी ,बस जाये ये रोम –रोम  में
कि कल तो  हवाएँ  घर होंगी , उड़ना हैं स्वप्न  विमानों में

आज गले लगा लो माँ ,कर दो प्रेम और करुणा का संचार
कि कल तो प्रेम केवल प्रदर्शन  होगा और सदभाव मिथ्याचार

आज और छोटा कर दो  माँ  , भूल जाऊँ चिंताए सारी
कि कल तो है सारा भार उठाना ,जीवन होगा एक लाचारी

बचपन की नासमझी में ही हैं माँ , जीवन के सारे रंग- रास
कि कल की आई सीख करेगी जीवन का उपहास

-    अमित गुप्ता



6 comments:

  1. Very well written ... and very true too...

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  2. kab roka hai maa ne tere ko,, jaha jana hai chale ja....

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  3. Amit this poem is amazing...i loved each and every line ...amit you are truly inspirational...fantastic stuff.. monika...

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  4. Superb..Its really true..Aaj aur chota kar do ma..beauty is in d word used and d way to express it..

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